Sunday, 9 November 2014

विशाल एकत्रिकरण शिविर में शामिल हुए स्वयंसेवक

9 नवम्बर विश्व संवाद केन्द्र उत्तराखंड। नव सृजन शिविर की पूर्व तैयारियों के चलते आज राष्ट्रीय स्वंसेवक संघ देहरादून महानगर ने एक विशाल एकत्रिकरण एमकेपी कालेज में आयोजित किया गया जो केवल स्नातक स्तर के छात्रों का था। कार्यक्रम में 6 सौ स्वयंसेवकों ने भाग लिया। इस एकत्रिकरण में उत्तराखण्ड प्रान्त प्रचारक डाॅ. हरीश का उद्बोधन भी हुआ। एकत्रिकरण का मुख्य लक्ष्य था कि आगामी 28,29,30 नवम्बर 2014 को पतंजलि योगपीठ हरिद्वार में संघ के सर्वोच अधिकारी सरसंघचालक डाॅ. मोहन भागवत का प्रवास होगा जिसमें उत्तराखण्ड के 5 हजार से अधिक स्नातक स्तरीय स्वयंसेवक ही भाग ले सकेंगे। इस अवसर पर आये स्यवंसेवकों ने व्यायाम योग का भी अभ्यास किया। डाॅ. हरीश ने उपस्थित छात्रों को सम्बोधित करते हुए कहा कि आज देश प्रगति के पथ पर अग्रसर है, आज आवश्यकता है कि बहुराष्ट्रीय संस्थानों के हित में कार्य न कर अपने स्वदेशी प्रतिष्ठानों लिये कार्य करें। इससे देश का पैसा देश का मान बढ़ायेगा। क्योंकि आज हर युवा के मन में है कि वह भी बुलेट ट्रेन का सफर करे और अपने देश को बुलेट की तरह तेजी से उत्कृष्ट व वैभवशाली बनाये। उन्होंनें बताया कि आज हमारे देश के युवाओं को भी जापान से सीख लेनी चाहिए कि किस तरह जापान न्यूकिलर तबाही से निकल कर आज सम्मपन है और भारत को नई तकनीक बेच रहा है। आज देश के युवाओं को अध्ययन की अवश्यकता है। डाॅ. हरीश ने बताया कि आज उत्तराखण्ड का जन्मदिवस है। दिग्विजय संन्यासी स्वामी विवेकानन्द ने भी विदेश यात्रा से पहले उत्तराखण्ड हिमालय में आकर साधना की। इस पुण्यभूमि के जन्मोत्सव के अवसर पर हमें प्रदेश के हित में कार्य करने, अपने को व समाज को अच्छा बनाने तथा अपनी मातृभूमि को विश्व गुरु बनाने का संकल्प लेना चाहिए। इस एकत्रिकरण में महानगर संघचालक गोपाल कृष्ण मित्तल, दून विश्वविद्यालय के प्रो. कपिल, विभाग प्रचारक भुवन, विभाग शारीरिक प्रमुख सुधीर कुमार, महानगर कार्यवाह अनिल नन्दा, सह कार्यवाह नन्दकिशोर, सायं महानगर कार्यवाह उदयपाल सिंह सहित 600 की संख्या में स्वयंसेवक उपस्थित थे।

अमेरिकी लालच में हुआ स्वदेशी बागवानी की ओर नहीं जा रही नजर
विश्व संवाद केन्द्र उत्तराखंड। उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में बागवानी को अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार बनाने के मकसद से 1953 में चैबटिया में स्थापित उद्यान निदेशालय के अफसरों ने ही बंटाधार किया है। कभी 400 क्विंटल सालाना सेब पैदा करने वाला चैबटिया का बगीचा इतने सालों में ऐसा बर्बाद हुआ कि आज सिर्फ चार क्विंटल सेब यहां पैदा होता है। उद्यान निदेशालय की कार्यप्रणाली से एक भी बागवान संतुष्ट नहीं है। विदेशी सेब के लालच में इस निदेशालय में बैठने वाले नीति निर्धारकों ने बगीचे से पुराने स्वदेशी प्रजाति के सेब के पेड़ों का सफाया कर अमेरिकी सेब के पौधे लगा दिए, लेकिन इस बात का ध्यान नहीं रखा गया कि अमेरिकी सेब के लिए यहां की जलवायु कैसी है। बागवानों को अर्थव्यवस्था की मुख्य धारा से जोड़ने का सपना बगीचे की बर्बादी के साथ ही चकनाचूर हो गया। चैबटिया में 106.91 हेक्टेअर भूमि में बगीचा और रिसर्च सेंटर स्थापित किया गया था। 53 हेक्टेअर में डेलीसिस, रॉयमर, फेनी, रेड गोल्ड, गोल्डन वैली जैसी सेब की स्वदेशी प्रजाति के पेड़ लगाए गए। हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड में भी यहीं के रिसर्च सेंटर से सेब के पौधे जाते थे। छह साल पहले बगीचे में से स्वदेशी प्रजाति के सेब के पौधों का सफाया कर अमेरिकी रेड फ्यूजी, रेड चीफ, डे बर्न जैसी बौनी प्रजाति के पौधे लगाए गए। बताते हैं कि अमेरिका से चैबटिया तक एक पौधा 400 रुपए में पहुंचा। कुल पांच हजार पौधे मंगाए गए और इन पौधों को 10 हेक्टेअर भूमि में लगाया गया, मगर जलवायु इस प्रजाति के अनुकूल न होने के कारण सेब का उत्पादन नहीं के बराबर हो रहा है। पुराने बगीचे के 43 हेक्टेयर क्षेत्रफल में सब्जी और अन्य फलों के पौधे लगा दिए गए। उद्यान अधीक्षक बीएल वर्मा बताते हैं कि वर्तमान में सिर्फ 10 हेक्टेयर भूमि में ही सेब का उत्पादन हो रहा है। अफसरों की काहिली की वजह से इस बर्बादी को रोकने के लिए सरकार ने भी कोई प्रयास नहीं किए। सीएम हरीश रावत ने हाल ही में कहा कि उद्यान की दशा सुधारने के लिए प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है, लेकिन अभी तक उद्यान के उद्धार का प्रस्ताव फाइलों में ही है। उत्तराखंड बनने के बाद यहां का रिसर्च सेंटर पंतनगर शिफ्ट हो गया था। 2012 में फिर से रिसर्च सेंटर यहां शिफ्ट किया गया, लेकिन अब रिसर्च नहीं होता, बल्कि मालियों को प्रशिक्षण दिया जाता है। एक तरह से उद्यान निदेशालय ने शानदार बगीचे को उजाड़कर बागवानों का भविष्य गर्त में धकेलने का भी काम किया है। क्षेत्र के सेब उत्पादक बागवानों ने पिछले तीन सालों से उद्यान निदेशालय से अमेरिकन प्रजाति के सेब के पौधे लेने बंद कर दिए हैं। उनका कहना है कि अमेरिकन सेब के पेड़ पर कीड़ा लग जाता है। दूसरी तरफ अमेरिकन प्रजाति का एक पेड़ चार से पांच किलो फल देता है। जबकि स्वेदशी प्रजाति के पेड़ एक बार में एक क्विंटल से अधिक फल देते हैं। अंग्रेज हुक्मरानों को खट्टा-मीठा सेब पसंद था। इस सेब का नाम रेड गोल्ड, गोल्डन वैली था। इसे अंग्रेज विदेशों से अपने साथ लेकर आए थे। धीरे-धीरे यह प्रजाति यहां मशहूर हुई। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी इस प्रजाति का उत्पादन होता है।


राज्य जन्मोत्सव पर लें विकास की शपथ: डा हरीश
विश्व संवाद केन्द्र उत्तराखंड। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उत्तराखण्ड प्रान्त प्रचारक डाॅ. हरीश जी ने कहा है कि आज के दिन हम सभी को राज्य के विकास की शपथ लेनी चाहिए। उन्होंने राज्य के सभी लोगों का आह्वान करते हुए कहा कि जब तक प्रत्येक व्यक्ति देश हित में सेवा भाव से काम नहीं करेगा तो विकास का कोई अर्थ नहीं है। सभी लोगों का समान रूप् से विकास ही सही मायने में विकास है।

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